القسم الرابع: نظام المعاملات المالية والأحكام

चौथा भाग: वित्तीय लेन-देन की व्यवस्था और नियम

الباب الأول: البيوع والتجارة والمعاملات والدين

पहला باب: बिक्री, व्यापार, लेन-देन और ऋण

قال رسول الله ﷺ «أَدْخَلَ الله الجَنَّةَ رَجُلًا كَانَ سَهْلًا: مُشْتَرِيًا، وَبَائِعًا، وَقَاضِيًا، وَمُقْتَضِيًا».

रसूलुल्लाह ﷺ ने कहा: «अल्लाह ने जन्नत में दाखिल किया एक ऐसे आदमी को जो सहज था — खरीदते समय सहज, बेचते समय सहज, फ़ैसला करते समय सहज और बकाया माँगने में सहज।»

قال رسول الله ﷺ «أَمَّا بَعْدُ، فَمَا بَالُ أَقْوَامٍ يَشْتَرِطُونَ شُرُوطًا لَيْسَتْ فِي كِتَابِ اللهِ، مَا كَانَ مِنْ شَرْطٍ لَيْسَ فِي كِتَابِ اللهِ عَزَّ وَجَلَّ فَهُوَ بَاطِلٌ، وَإِنْ كَانَ مِائَةَ شَرْطٍ، قَضَاءُ اللهِ أَحَقُّ، وَشَرْطُ اللهِ أَوْثَقُ، وَإِنَّمَا الْوَلَاءُ لِمَنْ أَعْتَقَ».

रसूलुल्लाह ﷺ ने कहा: «अब आगे क्या बात है — कुछ लोग ऐसी शर्तें लगाते हैं जो अल्लाह की किताब में नहीं हैं; जो भी शर्त अल्लाह की किताब में न हो वह बेअसर है, भले वह सौ शर्तें ही क्यों न हों; अल्लाह का फैसला अधिक हक़दार है और अल्लाह की शर्त अधिक पक्की है। और वलायात उसी की है जिसने आज़ाद किया।»

قال رسول الله ﷺ «ثَلَاثَةٌ لَا يُكَلِّمُهُمُ اللهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَلَا يَنْظُرُ إِلَيْهِمْ رَجُلٌ حَلَفَ عَلَى سِلْعَةٍ لَقَدْ أُعْطِيَ بِهَا أَكْثَرَ مِمَّا أُعْطِيَ وَهُوَ كَاذِبٌ، وَرَجُلٌ حَلَفَ عَلَى يَمِينٍ كَاذِبَةٍ لِيَقْتَطِعَ بِهَا مَالَ رَجُلٍ مُسْلِمٍ، وَرَجُلٌ مَنَعَ فَضْلَ مَاءٍ فَيَقُولُ اللهُ الْيَوْمَ أَمْنَعُكَ فَضْلِي كَمَا مَنَعْتَ فَضْلَ مَا لَمْ تَعْمَلْ يَدَاكَ».

रसूलुल्लाह ﷺ ने कहा: «तीन ऐसे लोग हैं जिनसे अल्लाह क़यामत के दिन बात नहीं करेगा और न ही उन्हें देखेगा: एक वह जो किसी माल पर ऐसा क़सम खाता है कि उसे उस पर अधिक दिया गया जबकि वह झूठ बोलता है; दूसरा वह जो झूठी कसम खा कर किसी मुसलमान की माल-सम्पत्ति से हिस्सा लेने की नीयत रखता है; और तीसरा वह जो पानी का फ़ज़्‍ल (अतिरिक्त पानी) रोकता है — तब अल्लाह कहेगा आज मैं भी तुम्हें अपना फ़ज़्ल/इनाम रोक दूँगा जैसे तुमने उस चीज़ का फ़ज़्ल रोका जिसे तुम्हारे हाथों ने नहीं बनाया।»

قال رسول الله ﷺ «رَحِمَ الله عَبْدًا سَمْحًا إِذَا بَاعَ، سَمْحًا إِذَا اشْتَرَى، سَمْحًا إِذَا قَضَى، سَمْحًا إِذَا اقْتَضَى».

रसूलुल्लाह ﷺ ने कहा: «अल्लाह उस बंदे पर रहम करे जो जब बेचता है उदार हो, जब ख़रीदता है उदार हो, जब फ़ैसला करता है उदार हो और जब वसूल करता है उदार हो।»

قال رسول الله ﷺ «لا تَحَاسَدُوا، وَلا تَنَاجَشُوا، وَلا تَبَاغَضُوا، وَلا تَدَابَرُوا، وَلا يَبِعْ بَعْضُكُمْ عَلَى بَيْعِ بَعْضٍ، وَكُونُوا عِبَادَ الله إِخْوَانًا، الْمُسْلِمُ أَخُو الْمُسْلِمِ، لا يَظْلِمُهُ، وَلا يَخْذُلُهُ، وَلَا يَحْقِرُهُ، التَّقْوَى هَاهُنَا، وَأَشَارَ إِلَى صَدْرِهِ، بِحَسْبِ امْرِئٍ مِنَ الشَّرِّ أَنْ يَحْقِرَ أَخَاهُ الْمُسْلِمَ، كُلُّ الْمُسْلِمِ عَلَى الْمُسْلِمِ حَرَامٌ، دَمُهُ، وَمَالُهُ، وَعِرْضُهُ».

रसूलुल्लाह ﷺ ने कहा: «एक-दूसरे से ईर्ष्या मत करो, और एक-दूसरे पर बोली लगाकर एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ मत करो, और बैर मत रखो, और पीठ न फेरो; और तुम अल्लाह के बन्दे बन कर भाई-भाई बनो। मुसलमान मुसलमान का भाई है — वह उस पर zulm नहीं करता, न उसे छोड़ता है, और न उसे तुच्छ समझता है। परहेज़गारी यहीं है,» और उन्होंने अपने सीने की ओर इशारा किया, «किसी व्यक्ति के लिए इतना बुरा काफी है कि वह अपने मुसलमान भाई को तुच्छ समझे। हर मुसलमान दूसरे मुसलमान के लिए हराम है — उसका ख़ून, उसकी दौलत और उसकी इज़्ज़त।»

قال رسول الله ﷺ «لا يَمْنَعُ أَحَدُكُمْ فَضْلَ مَاءٍ لِيَمْنَعَ بِهِ الْكَلأ».

रसूलुल्लाह ﷺ ने कहा: «तुम में से किसी को भी अतिरिक्त पानी रोकना नहीं चाहिए ताकि वह उससे चरागाह/घास को न मिल सके।»

قال رسول الله ﷺ «لا يَمْنَعْ جَارٌ جَارَهُ أَنْ يَغْرِزَ خَشَبَةً فِي جِدَارِهِ».

रसूलुल्लाह ﷺ ने कहा: «किसी पड़ोसी को अपने पड़ोसी को उसकी दीवार में लकड़ी ठूँसने (खम्बा गाड़ने) से रोकने का हक़ नहीं।»

قال رسول الله ﷺ «مَنْ طَالَبَ حَقًّا فَلْيَطْلُبْهُ فِي عَفَافٍ» وَافٍ، أَوْ غَيْرِ وَافٍ».

रसूलुल्लाह ﷺ ने कहा: «जो कोई अपना हक मांगता है तो वह उसे शालीनता/इज़्ज़त के साथ माँगे — चाहे वह पूरा हो या अधूरा।»

الباب الثاني: فقه القضاء، نظام القضاء والإمارة في الإسلام

दूसरा باب: क़ज़ा का फिक़ह, इस्लाम में न्याय व्यवस्था और शासन

قال رسول الله ﷺ «إِنِي لَمْ أُومَرْ أَنْ أَنْقُبَ عَنْ قُلُوبِ النَّاسِ وَلَا أَشُقَّ بُطُونَهُمْ».

रसूलुल्लाह ﷺ ने कहा: «मुझे लोगों के दिलों में खंगालने या उनके पेट फाड़ने का आदेश नहीं दिया गया है।»

قال رسول الله ﷺ «رُفِعَ الْقَلَمُ عَنْ ثَلَاثَةٍ عَنِ النَّائِمِ حَتَّىٰ يَسْتَيْقِظَ، وَعَنِ الْمُبْتَلَىٰ حَتَّىٰ يَبْرَأَ، وَعَنِ الصَّبِيِّ حَتَّىٰ يَكْبُرَ».

रसूल्लाह ﷺ ने कहा: «कलम तीन लोगों के बारे में उठी हुई है: सोए हुए के बारे में जब तक वह जाग न जाए, जिस पर तकलीफ/परीक्षा आई हो उसके बारे में जब तक वह ठीक न हो जाए, और बच्चे के बारे में जब तक वह बालिग न हो जाए।»

قال رسول الله ﷺ «كَيْفَ يُقَدِّسُ اللهُ أُمَّةً لا يَأْخُذُ ضَعِيفُهَا حَقَّهُ مِنْ قَوِيِّهَا، وَهُوَ غَيْرُ مُتَعْتَعٍ».

रसूलुल्लाह ﷺ ने कहा: «अल्लाह कैसे किसी ऐसी उम्मत को पवित्र ठहरा देगा जिसकी कमजोर लोगों को अपने ताकतवरों से उनका हक न मिले, जबकि वह अन्याय करने वाला नहीं है।»

الباب الثالث: أقضية الرسول صلوات الله وسلامه عليه

तीसरा باب: रसूल (उन पर अल्लाह की दुआएँ और सलाम) के न्यायिक मामले

قال رسول الله ﷺ «مَا تَأْمُرُنِي؟.. تَأْمُرُنِي أَنْ آمُرَهُ أَنْ يَدَعَ يَدَهُ فِي فِيكَ تَقْضَمُهَا كَمَا يَقْضَمُ الفَحْلُ؟ اذْفَعْ يَدَكَ حَتَّى يَعَضَّهَا ثُمَّ انْتَزِعْهَا».

रसूलुल्लाह ﷺ ने कहा: «तुम मुझे क्या बतलाते हो?.. क्या तुम मुझे आदेश देते हो कि मैं उसे कहूँ कि वह अपना हाथ तेरे अंदर छोड़ दे ताकि वह उसे वैसे ही काट दे जैसे एक नर-जानवर काटता है? अपना हाथ धक्का दो जब तक वह उसे काट न ले, फिर उसे खींच लो.»

قال رسول الله ﷺ «مَا عَلَّمْتَهُ إِذْ كَانَ جَاهِلًا، وَلا أَطْعَمْتَهُ إِذْ كَانَ جَائِعًا».

रसूलुल्लाह ﷺ ने कहा: «मैंने उसे उस समय नहीं सिखाया जब वह जاہिल था, और न ही मैंने उसे खिलाया जब वह भूखा था.»

قال رسول الله ﷺ «يَا زُبَيْرُ اسْقِ، ثُمَّ احْبِسِ الْمَاءَ حَتَّى يَرْجِعَ إِلَى الْجَدْرِ».

रसूलुलाह ﷺ ने कहा: «ऐ ज़ुबैर, पानी पिला, फिर पानी रोक कर रखो जब तक वह घड़े में वापस न लौट आए.»