القسم الثاني: أحكام العبادات

द्वितीय भाग: इबादतों के नियम

الباب الأول: الطهارة

पहला अध्याय: पवित्रता

قال رسول الله ﷺ «لَا تُزْرِمُوهُ.. دَعُوهُ» قاله ﷺ للصحابة بشأن أعرابي بال في ناحية المسجد ثم دعاه وقال له «إِنَّ هَذِهِ الْمَسَاجِدَ لَا تَصْلُحُ لِشَيْءٍ مِنْ هَذَا الْبَوْلِ وَلَا الْقَذَرِ، إِنَّمَا هِيَ لِذِكْرِ اللهِ عَزَّ وَجَلَّ، وَالصَّلَاةِ وَقِرَاءَةِ الْقُرْآنِ».

अल्लाह के पैगंबर ﷺ ने फरमाया, "उसे मत रोको... उसे छोड़ दो।" यह बात उन्होंने ﷺ सहाबा (अपने साथियों) से एक देहाती व्यक्ति के बारे में कही, जिसने मस्जिद के एक कोने में पेशाब कर दिया था। फिर उन्होंने उसे बुलाया और उससे कहा, "वास्तव में, ये मस्जिदें इस तरह के पेशाब या किसी भी गंदगी के लिए उपयुक्त नहीं हैं। ये तो केवल सर्वशक्तिमान अल्लाह के ज़िक्र (स्मरण), नमाज़ (प्रार्थना) और क़ुरआन के पाठ के लिए हैं।"

الباب الثاني: الصلاة والمساجد

दूसरा अध्याय: नमाज़ और मस्जिदें

«مَنْ تَطَهَّرَ فِي بَيْتِهِ ثُمَّ مَشَى إِلَى بَيْتٍ مِنْ بُيُوتِ الله لِيَقْضِيَ فَرِيضَةً مِنْ فَرَائِضِ الله كَانَتْ خَطْوَتَاهُ إِحْدَاهُمَا تَحُطُّ خَطِيئَةً وَالأُخْرَى تَرْفَعُ دَرَجَةً».

«जो कोई अपने घर में पवित्र होकर (वुज़ू करके) चले और फिर अल्लाह के घरों में से किसी घर की ओर जाए ताकि अल्लाह के फ़राइज़ में से किसी फ़र्ज़ को अदा करे, उसके दोनों कदमों में से एक गुनाह मिटा देती है और दूसरी उसकी दर्जा बढ़ा देती है.»

الباب الثالث: الزكاة والصدقات

तीसरा अध्याय: ज़कात और दान

قال رسول الله ﷺ «تَبَسُّمُكَ فِي وَجْهِ أَخِيكَ لَكَ صَدَقَةٌ، وَأَمْرُكَ بِالْمَعْرُوفِ وَنَهْيُكَ عَنِ الْمُنْكَرِ صَدَقَةٌ، وَإِرْشَادُكَ الرَّجُلَ فِي أَرْضِ الضَّلَالِ لَكَ صَدَقَةٌ، وَإِمَاطَتُكَ الْحَجَرَ وَالشَّوْكَةَ وَالْعَظْمَ عَنِ الطَّرِيقِ لَكَ صَدَقَةٌ، وَإِفْرَاغُكَ مِنْ دَلْوِكَ فِي دَلْوِ أَخِيكَ لَكَ صَدَقَةٌ».

अल्लाह के रसूल ﷺ ने फरमाया, "अपने भाई के चेहरे पर तुम्हारी मुस्कान तुम्हारे लिए दान है, और तुम्हारा अच्छे काम का आदेश देना और बुरे काम से रोकना दान है, और रास्ता भटके हुए व्यक्ति को सही राह दिखाना तुम्हारे लिए दान है, और रास्ते से पत्थर, काँटा और हड्डी हटाना तुम्हारे लिए दान है, और अपने डोल से अपने भाई के डोल में पानी डालना तुम्हारे लिए दान है।"

قال رسول الله ﷺ «أَنْفِقِي وَلا تُحْصِي فَيُحْصِي اللهُ عَلَيْكِ، ولَا تُوعِي فَيُوعِي اللهُ عَلَيْكِ».

अल्लाह के रसूल ﷺ ने फरमाया, 'खर्च करो और (उसे) गिनो मत, वरना अल्लाह भी तुम्हारे लिए (अपनी देन को) गिनेगा। और (अपनी नेमतों को) रोककर मत रखो, वरना अल्लाह भी तुम्हारे लिए (अपनी नेमतों को) रोक देगा।'

قال رسول الله ﷺ «مَنْ سَأَلَ النَّاسَ أَمْوَالَهُمْ تَكَثُّرًا فَإِنَّمَا يَسْأَلُ جَمْرًا فَلْيَسْتَقِلَّ أَوْ لِيَسْتَكْثِرْ».

अल्लाह के पैगंबर ﷺ ने फरमाया, "जो लोगों से उनका धन अपनी संपत्ति बढ़ाने के उद्देश्य से मांगता है, तो वह वास्तव में अंगारे ही मांग रहा है। तो अब चाहे वह कम अंगारे ले या अधिक (यह उसकी मर्ज़ी है)।"

الباب الرابع: الحج والعمرة والزيارة

चौथा अध्याय: हज, उमरा और ज़ियारत

قال رسول الله ﷺ في خطبة الوداع: «يَا أَيُّهَا النَّاسُ أَيُّ يَوْمٍ هَذَا قَالُوا: يَوْمٌ حَرَامٌ، قَالَ (فَأَيُّ بَلَدٍ هَذَا) قَالُوا بَلَدٌ حَرَامٌ قَالَ (فَأَيُّ شَهْرٍ هَذَا) قَالُوا شَهْرٌ حَرَامٌ قَالَ (فَإِنَّ دِمَاءَكُمْ وَأَمْوَالَكُمْ وَأَعْرَاضَكُمْ عَلَيْكُمْ حَرَامٌ، كَحُرْمَةِ يَوْمِكُمْ هَذَا، فِي بَلَدِكُمْ هَذَا، فِي شَهْرِكُمْ هَذَا، اللَّهُمَّ هَلْ بَلَّغْتُ، اللَّهُمَّ هَلْ بَلَّغْتُ، فَلْيُبَلِّغِ الشَّاهِدُ الْغَائِبَ، لَا تَرْجِعُوا بَعْدِي كُفَّارًا يَضْرِبُ بَعْضُكُمْ رِقَابَ بَعْضٍ».

रसूल अल्लाह ﷺ ने वसीयात-खुत्बे (खुत्बत‍-उल-वदाः) में कहा: «ऐ लोगों! यह कौन-सा दिन है?» लोगों ने कहा: «यह एक पवित्र (हराम) दिन है।» फिर उन्होंने कहा: «यह कौन-सा नगर/देश है?» उत्तर मिला: «यह पवित्र नगर है।» फिर पूछा: «यह कौन-सा महीना है?» कहा गया: «यह पवित्र महीना है।» तब उन्होंने कहा: «निश्चय ही तुम्हारा खून, तुम्हारी संपत्तियाँ और तुम्हारी इज़्ज़तें तुम पर पवित्र हैं, जैसे यह तुम्हारा यह दिन पवित्र है, इस तुम्हारे नगर में, इस तुम्हारे महीने में। अल्लाहुम्मा! क्या मैंने पहुँचा दिया? अल्लाहुम्मा! क्या मैंने पहुँचा दिया? अतः जो उपस्थित है वह अनुपस्थित तक पहुँचा दे। मेरे बाद तुम काफ़िरों की तरह मत लौटो; कि तुम में से कुछ लोग एक दूसरे का गला मारने लगें।»

الباب الخامس: الجنائز والوفاة والقبور

पाँचवाँ अध्याय: जनाज़ा, मृत्यु और कब्रें

قال رسول الله ﷺ «اذْكُرُوا مَحَاسِنَ مَوْتَاكُمْ وَكُفُّوا عَنْ مَسَاوِيهِمْ».

रसूलल्लाह ﷺ ने कहा: «अपने मरने वालों की अच्छाइयाँ याद करो और उनकी बुराइयों से परहेज़ करो।»

قال رسول الله ﷺ «(السَّلَامُ عَلَيْكُمْ دَارَ قَوْمٍ مُؤْمِنِينَ، وَإِنَّا إِنْ شَاءَ اللهُ بِكُمْ لَاحِقُونَ، وَدِدْتُ أَنَّا قَدْ رَأَيْنَا إِخْوَانَنَا)» قَالُوا: أَوَلَسْنَا إِخْوَانَكَ؟ قَالَ: «بَلْ أَنْتُمْ أَصْحَابِي، وَإِخْوَانُنَا الَّذِينَ لَمْ يَأْتُوا بَعْدُ» فَقَالُوا كَيْفَ تَعْرِفُ مَنْ لَمْ يَأْتِ بَعْدُ مِنْ أُمَّتِكَ؟ فَقَالَ: «أَرَأَيْتَ لَوْ أَنَّ رَجُلًا لَهُ خَيْلٌ غُرٌّ مُحَجَّلَةٌ بَيْنَ ظَهْرَيْ خَيْلٍ دُهْمٍ بُهْمٍ أَلَا يَعْرِفُ خَيْلَهُ؟) قَالُوا: بَلَى، قَالَ: (فَإِنَّهُمْ يَأْتُونَ غُرًّا مُحَجَّلِينَ مِنَ الْوُضُوءِ، وَأَنَا فَرَطُهُمْ عَلَى الْحَوْضِ، أَلَا لَيُذَادَنَّ رِجَالٌ عَنْ حَوْضِي كَمَا يُذَادُ الْبَعِيرُ الضَّالُّ، أُنَادِيهِمْ أَلَا هَلُمَّ فَيُقَالُ: إِنَّهُمْ قَدْ بَدَّلُوا بَعْدَكَ فَأَقُولُ: سُحْقًا سُحْقًا)».

रसूलल्लाह ﷺ ने कहा: «(तुम पर सलाम हो, ए उन लोगों की बस्ती जो मोमिन हैं, और अगर अल्लाह चाहे तो हम तुम्हारे पास पहुँच ही जाएंगे; काश कि हम ने अपने भाइयों को देख लिया होता)» लोगों ने कहा: "क्या हम तुम्हारे भाई नहीं हैं?" उन्होंने कहा: «नहीं, तुम मेरे साथी हो, और हमारे भाई वे हैं जो अभी नहीं आए हैं।» उन्होंने पूछा: "आप कैसे पहचानेंगे जो अभी नहीं आएँगे आपकी उम्मत में?" उन्होंने कहा: «क्या तुम देखते हो कि अगर किसी आदमी के घोड़े हों—एक चमकदार (ghurr) जो आँखों पर काजल जैसा निशान (muhajjalah) लिए हुए हो, और वह दो गहरे रंग के घोड़ों के बीच का हो—क्या वह अपना घोड़ा नहीं पहचान लेगा?" उन्होंने कहा: "हाँ।" फिर कहा: «वह लोग वुज़ू से चमकते हुए आएँगे, और मैं उनके हौज़ पर उनका आख़िरी रहूँगा; निश्चय ही कुछ लोग मेरे हौज़ से हटाए जाएँगे जैसे भटका हुआ ऊँट हटाया जाता है; मैं उन्हें बुलाऊँगा पर कहा जाएगा: 'वे तुम्हारे बाद बदल गए हैं' और मैं कहूँगा: 'बर्बाद! बर्बाद!'»

قال رسول الله ﷺ «لا تسبوا الأموات، فتؤذوا الأحياء».

रसूलल्लाह ﷺ ने कहा: «मृतकों की गाली मत दो, इससे जिंदा लोगों को तकलीफ़ पहुँचती है।»

قال رسول الله ﷺ «لَا يَتَمَنَّيَنَّ أَحَدٌ مِنْكُمُ الْمَوْتَ إِمَّا مُحْسِنًا فَلَعَلَّهُ أَنْ يَزْدَادَ خَيْرًا، وَإِمَّا مُسِيئًا فَلَعَلَّهُ أَنْ يَسْتَعْتِبَ».

रसूलल्लाह ﷺ ने कहा: «तुम में से कोई भी मौत की कामना न करे; अगर वह भला हो तो शायद वह और भलाई पाए, और अगर बुरा हो तो शायद वह तौबा कर ले।»

قال رسول الله ﷺ «مَا مِنْ مُسْلِمَيْنِ يَتَوَفَّى لَهُمَا ثَلَاثَةٌ مِنَ الْوَلَدِ لَمْ يَبْلُغُوا الْحِنْثَ إِلَّا أَدْخَلَهُمُ الله الجَنَّةَ بِفَضْلِ رَحْمَةِ الله إِيَّاهُمْ».

रसूलल्लाह ﷺ ने कहा: «ऐसे दो मुसलमान नहीं हैं जिनके तीन बच्चे जो इयत्ते (बड़े होने) तक न पहुँचे हों, उनसे उठ लिए जाएँ, सिवाय इसके कि अल्लाह ने उन्हें अपनी कृपा और रहमत से जन्नत में दाखिल कर दिया।»

قال رسول الله ﷺ «مَنْ عَادَ مَرِيضًا لَمْ يَزَلْ فِي خُرْفَةِ الجَنَّةِ حَتَّى يَرْجِعَ».

रसूलल्लाह ﷺ ने कहा: «जो किसी बीमार को लेने (या मिलने) जाता है वह लौटने तक जन्नत के एक बगीचे में रहता है।»

قال رسول الله ﷺ «يَقُولُ اللهُ تَعَالَى: مَا لِعَبْدِي الْمُؤْمِنِ عِنْدِي جَزَاءٌ إِذَا قَبَضْتُ صَفِيَّهُ مِنْ أَهْلِ الدُّنْيَا ثُمَّ احْتَسَبَهُ إِلَّا الْجَنَّةُ».

रसूलल्लाह ﷺ ने कहा: «अल्लाह तआला कहते हैं: मेरे पास मेरे उस मोमिन बंदे का क्या इनाम है अगर मैंने दुनिया के उसके प्यारे लोगों में से किसी को उठा लिया और उसने इसे (सहे हुए) मेरा बदला माना—सिवाय जन्नत के?»