अल्लाह द्वारा नाज़िल की गई किताबों में ईमान

मुसलमान उन सभी किताबों पर ईमान रखता है जिन्हें अल्लाह ने अपने नबियों पर नाज़िल किया, जैसे इब्राहिम की सुफ़ुफ़, मूसा की किताबें, दाउद का ज़बूर और ईसा عليه السلام की इनजील. यह ईमान उसकी अक़ीदा का अहम हिस्सा है क्योंकि यह मंज़ूर करता है कि हिदायत और हक़ का स्रोत अल्लाह ही है जिसने अपनी सिलसिलेवार रसालात के ज़रिए इंसानियत को बुलाया; इससे मोमिन के दिल में उन तमाम नबियों के प्रति इज़्ज़त पैदा होती है जिन्होंने ये संदेश लोगों तक पहुँचाए.

क़ुरआन करीम पिछली इलााही किताबों पर हुक़ूमत करने वाला और फ़ैसला देने वाला मीयार है; यही वह तराज़ू है जिससे आज हमारे पास मौजूद मतनों को तौज़ीन किया जाता है. जो कुछ भी उन पुरानी किताबों की खबरें क़ुरआन से मिलती हैं, हम उनकी सच्चाई और बरक़रारी में ईमान रखते हैं; और जो कुछ क़ुरआन के ख़िलाफ़ या उससे टकराता है, हम समझते हैं कि वह समय के साथ तहरीफ और बदलाब का शिकार हुआ है और वैसा नहीं रह गया जैसा अल्लाह ने असल में नाज़िल किया था.

क़ुरआन ने अपनी तरफ़ से पहले की रसालात की तसदीक की और उन पर आ चुकी तहरीफ़ों को ठीक किया; बल्कि टोराह और इनजील में भी मुहम्मद ﷺ की ख़ुशख़बरी आई है. यह तसदीक इलाही बुनियाद की वफ़ा और एकता को दिखाती है और क़ुरआन को आख़िरी व भरोसेमंद मिर्च (हवाला) बनाती है जो इंसानियत के लिये उन नाज़िल किताबों में अल्लाह की मंशा की सच्चाई को महफ़ूज़ रखती है.

इन किताबों पर ईमान का मुख़्य मक़सद यह मान लेना है कि वे हिदायत और रोशनी हैं. और भले ही हम मानते हैं कि पुरानी किताबों में तहरीफ़ आई है, इसका मतलब यह नहीं कि हम उन्हें नज़रअंदाज़ कर दें; बल्कि हम क़ुरआन के बताए हुए उन अहम हुक्मों और मूल्यों को थामे रहते हैं जिन्हें अल्लाह ने अपनी किताब में अमर किया है. इसी तरह मुसलमान नबीयों की उस पाक सिलसिले से जुड़ा रहता है, तमाम रसालात का आदर करता है और क़ुरआन को ज़िन्दगी का मअनहज (राह) मानता है.

يؤمن المسلم بجميع الكتب التي أنزلها الله على أنبيائه، كصحف إبراهيم وموسى، وزبور داود، وإنجيل عيسى عليه السلام. هذا الإيمان جزء لا يتجزأ من عقيدته، حيث يقر بأن الله هو مصدر الهداية والحق الذي خاطب به البشرية عبر رسالاته السماوية المتتالية، مما يغرس في نفس المؤمن احترام جميع الأنبياء الذين بلغوا هذه الرسالات للناس.

يعد القرآن الكريم المهيمن والحاكم على ما سبقه من الكتب السماوية؛ فهو الميزان الذي نزن به ما بين أيدينا اليوم من نصوص. فكل ما وافق القرآن من أخبار تلك الكتب نؤمن بصحته وبقائه، أما ما خالفه أو تناقض معه، فنوقن بأنه تعرض للتحريف والتبديل على مر العصور، ولا يمثل كلام الله الأصلي كما نزل.

لقد جاء القرآن الكريم مصدقاً لما قبله من رسالات مع تصحيح ما لحق بها من تحريف، بل وجاء بالبشارة بالنبي محمد ﷺ في التوراة والإنجيل. إن هذا التصديق يبين وحدة المصدر الإلهي، ويجعل من القرآن المرجع النهائي والأمين الذي يحفظ للبشرية حقيقة ما أراده الله في تلك الرسالات المنزلة سابقاً.

إن جوهر الإيمان بهذه الكتب يكمن في التسليم بأنها هدى ونور. ومع إيماننا بوقوع التحريف في الكتب السابقة، لا نتجاهلها، بل نتمسك بما أخبرنا القرآن عن جوهر أحكامها وقيمها التي خلدها الله في كتابه. وبذلك، يظل المسلم موصولاً بسلسلة النبوات المباركة، محترماً لرسالات الله جميعاً، ومتمسكاً بالقرآن كمنهج حياة.