क़द्र पर ईमान

इस्लाम में क़द्र पर ईमान का मतलब ज़बरदस्ती या आलस्य नहीं है, बल्कि यह अल्लाह की मंशा को मानने के साथ-साथ इंसान की ज़िम्मेदारी को भी स्वीकार करना है। अल्लाह का न्याय मानवीय सीमित मानदण्डों से नापा नहीं जा सकता; जैसे कभी विद्यार्थी शिक्षक की सज़ा को अन्याय समझ सकता है जबकि वह उसके भले के लिए ही न्याय हो, वैसे ही अल्लाह की क़िस्मत हमें रहस्यमय लग सकती है, मगर असल में उसमें حکمت और عدل है जिनके हर पहलू को हम घेर नहीं पाते।

अल्लाह ने इन्सान को अक्ल और इरादा दिया है, और उसे उसकी क्षमता और आज़ादी की सीमा में ही जवाबदेह ठहराएगा। जिन النصوص से ज़बरदस्ती का तात्पर्य लिया जाता है वे उन सार्वभौमिक बातों की ओर इशारा करती हैं जो हमारी पहुँच से बाहर हैं और जिनके लिए बन्दा सवाल नहीं किया जाता, जबकि वे अमल जिनके बदले में सवाब या अज़ाब मँडराते हैं वे इंसान के चुनाव के दायरे में आते हैं। इसलिए हिदायत और गुमराही उस शख्स की मेहनत और उसके स्वेच्छापूर्ण कर्मों का नतीजा हैं।

पूर्व के नेक लोगों ने क़द्र पर ईमान को काम, जिहाद और कारण अपनाने की प्रेरणा मानकर यह समझा कि रोज़ी और अज़्म मुक़द्दर हैं; इसलिए उन्होंने मेहनत की और अल्लाह पर तोक़ल किया बिना आलस्य के। वहीं क़द्र का सहारा लेकर कर्तव्य की नाकामी या गुनाह का बहाना बनाना एक कमजोर और अस्वीकार्य दलील है, क्योंकि इंसान अपने आने वाले कल को नहीं जानता और अक्सर अपनी हवाओं का पालन कर बैठता है — इसलिए किसी के पास अल्लाह के आदेशों को छोड़े रहने का बहाना नहीं है।

الإيمان بالقدر في الإسلام لا يعني الجبر أو التواكل، بل هو إقرار بمشيئة الله مع إثبات مسؤولية الإنسان. إن عدالة الله لا تُقاس بمقاييس البشر القاصرة؛ فكما قد يرى التلميذ تأديب معلمه ظلماً وهو عين العدل لمصلحته، قد تبدو لنا أقدار الله غامضة، لكنها في جوهرها حكمة وعدل لا نحيط بكافة جوانبهما.

يعطي الله الإنسان عقلاً وإرادة، ويحاسبه في نطاق قدرته وحريته فقط. النصوص التي توحي بالإجبار تشير إلى أمور كونية فوق طاقتنا لا يُسأل عنها العبد، بينما الأعمال التي يترتب عليها الثواب والعقاب هي في دائرة اختيار الإنسان. لذا، فإن الهداية والضلال هما نتيجة لسعي المرء وأعماله التي اختارها بإرادته الحرة.

اتخذ السلف الصالح من الإيمان بالقدر دافعاً للعمل والجهاد والأخذ بالأسباب، مؤمنين أن الرزق والأجل مقدران، فعملوا بجد وتوكلوا على الله دون كسل أو خمول. أما الاحتجاج بالقدر لتبرير التقصير أو المعصية فهو حجة واهية ومردودة، لأن الإنسان لا يعلم غيبه، بل يستجيب لشهوته، فليس لأحد عذر في ترك ما أمره الله به.