क़ुबूल होने वाली दुआ की चाबी
«الدُّعَاءُ مَوْقُوفٌ بَيْنَ السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ لَا يَصْعَدُ مِنْهُ شَيْءٌ حَتَّى تُصَلِّيَ عَلَى نَبِيِّكَ»
दुआ (du'a) आसमान और ज़मीन के बीच लटकी रहती है और जब तक तुम नबी ﷺ पर सलावत न भेजो, इसका कोई भाग ऊपर नहीं चढ़ता।
शेख़ अब्दुल्लाह सिराज अल-दीन ने शुरुआती अधिकारियों से दर्ज एक गहन सिद्धांत बताया है: नबी ﷺ पर सलावत अपने आप में हमेशा अल्लाह द्वारा कबूल होती है — इसे कभी नकारा नहीं जाता। दूसरी ओर दुआ (du'a) कबूल भी हो सकती है और नहीं भी। पर जब कोई व्यक्ति अपनी दुआ की शुरुआत और अंत सलावत से करता है, तो अल्लाह — अपनी उदारता में — दोनों सिरों को स्वीकार करके उनके बीच जो है उसे नकार नहीं सकता। इस तरह सलावत वह वाहन बन जाती है जो हर दूसरी दुआ को कबूलीयत तक पहुँचा देती है।
- सलावत हमेशा कबूल की जाती है — इसे कभी भी अल्लाह द्वारा नकारा नहीं जाता
- दुआ (du'a) जो शुरुआत और अंत में सलावत से घिरी होती है, सलावत की कबूलीयत की निश्चितता द्वारा वहन होती है
- यह शिक्षा हर दुआ की शुरुआत और अंत में नबी ﷺ पर सलावत भेजने के अभ्यास को प्रेरित करती है।