Salawat कब पढ़ी जाती है: नियम

«الْبَخِيلُ الَّذِي مَنْ ذُكِرْتُ عِنْدَهُ فَلَمْ يُصَلِّ عَلَيَّ»

कंजूस वह है जिसकी मौजूदगी में मेरा ज़िक्र किया जाए और वह मुझ पर सलावत न भेजे।

रिवायत अल-तिरमिधी द्वारा (hasan sahih gharib); साथ ही अल-नासाई, इब्न हिब्बान, और अल-हाकिम में भी।

पैगंबर ﷺ पर Salawat एक हुक्मशुदा इबादत है, जिसमें कुछ विशेष मौक़े होते हैं जहाँ इसकी स्थिति फ़र्ज़ से लेकर ज़ोरदार सिफ़ारिश तक बदलती है। Sheikh Abdullah Siraj al-Din ने इन्हें स्पष्ट श्रेणियों में व्यवस्थित किया है।

उलमाओं ने इस बारे में लापरवाही से आगाह किया है। कई हदीसें उस गंभीर नतीजे का वर्णन करती हैं जब पैगंबर का नाम लिया जाए और सलावत न भेजी जाए — इसमें फ़रिश्ता जिब्रील (Gabriel) की दुआ भी शामिल है, जिस पर पैगंबर ﷺ ने 'आमीन' कहा।

  • उलमाओं के इज्मा' (ijma') के अनुसार वाजिब: किसी के जीवन में कम से कम एक बार — हर मुसलमान का न्यूनतम फर्ज़।
  • रोज़ाना की नमाज़ में एक रुक्न (rukn) या फ़र्ज़ (fard): हर सलात के अंतिम तशहुद में, शाफ़ई और हनबली मज़हबों के अनुसार।
  • जब भी पैगंबर का नाम लिया जाए तब यह वाजिब या बहुत ज़ोर देकर कहा गया है: यह 'कंजूस' की हदीस पर आधारित है।
  • अनुशंसित (सुनन मुअक्कदा): दुआ की शुरुआत, बीच और अंत में; मुअज़्ज़िन के जवाब देने के बाद; मस्जिद में दाख़िल और बाहर निकलते समय; शुक्रवार और उसकी पूर्व संध्या पर; तथा कई अन्य मौक़ों पर।