उनकी चाल और अदा ﷺ

उनका शरीफ़ चलना ﷺ

हिंद بن أبي हالة رضي الله عنه ने उनकी चाल का वर्णन करते हुए कहा: «जब वह चलने लगते तो तुरंत निकल पड़ते, थोड़े‑से आगे झुक कर भरोसे और गरिमा के साथ कदम रखते और शांतिपूर्वक चलते; उनकी चाल चौड़ी और तेज़ थी — जब वह चलते तो ऐसा प्रतीत होता था मानो कोई भारी तरल नीचे गिर रहा हो, और जब वह मुड़ते तो पूरा बदन मुड़ जाता।» وقال علي رضي الله عنه: «إذا مشى تكفَّأ تكفُّؤاً كأنما ينحطُّ من صبَب». وقال أبو هريرة رضي الله عنه: «ما رأيتُ أحداً أسرع في مشيته من رسول الله ﷺ كأن الأرض تُطوى له، وإنا لنُجهد أنفسنا وإنه لغير مكترث» — यह बयान अत‑तिरमज़ी ने 'अश‑शमाइल' में روایت किया।

  • कأنما ينحطُّ من صبَب — आत्मविश्वासी, मजबूत और भव्य चाल
  • يخطو تكفِّياً — भरोसे और गरिमा के साथ हल्का‑सा आगे झुककर कदम बढ़ाना
  • ذريع المشية — चौड़ी और तेज़ चाल
  • يمشي هوناً — शांति और गरिमा के साथ चलता, बिना घमंड के
  • الأرض تُطوى له — (बताया) أبو هريرة رضي الله عنه ने इसे अत‑तिरमज़ी में कहा
  • إذا التفت التفت جميعاً — जब वह मुड़ते तो सिर ही नहीं बल्कि पूरा बदन मुड़ता

उनकी अदा ﷺ — बैठने और खड़े होने में

كان ﷺ إذا جلس في مجلسه أكثر جلوسه مُتربِّعاً، وربما احتبى بيديه. وكان إذا جلس مع أصحابه لا يُفرَّق بينه وبين أصحابه؛ فلا يعرفه الغريب حتى يسأل. وكان إذا قام من مجلسه قال: «سبحانك اللهم وبحمدك، أشهد ألا إله إلا أنت، أستغفرك وأتوب إليك». وكان لا يُرى قط جالساً ممدود الرجلين إلا قليلاً. — पैग़म्बर ﷺ जब अपनी सभा में बैठते तो ज़्यादातर क्रॉस‑लेग (मुटरब्बअ) होकर बैठते थे और कभी‑कभी हाथ अपने घुटनों पर रखते थे। जब वह अपने साथियों के साथ बैठते तो उनके और साथियों के बीच कोई फर्क न दिखता; अजनबी उन्हें पहचान न पाता जब तक पूछ न लेता। जब वे सभा से उठते तो कहते: “तुम पाक हो हे अल्लाह और तुम्हारी स्तुति है; मैं गवाही देता हूँ कि तुम्हारे सिवा कोई ईश्वर नहीं; मैं तुमसे क्षमा माँगता हूँ और तेरी बार बार तौबा करता हूँ।” वे शायद ही कभी पैरों को आगे फैलाकर बैठे दिखे।

  • أكثر جلوسه مُتربِّعاً — وربما احتبى — उनकी अधिकतर बैठने की मुद्रा पर‑पैर मोड़कर (क्रॉस‑लेग) बैठना थी — और कभी‑कभी वे हाथ जोड़ लेते थे
  • لا يُفرَّق في مجلسه بينه وبين أصحابه — فلا يعرفه الغريب — उनकी महफ़िल में वे और उनके साथी अलग नहीं होते; इसलिए कोई अजनबी उन्हें पहचान नहीं पाता
  • كان يقول عند قيامه من المجلس: «سبحانك اللهم وبحمدك» — वे सभा से उठते समय कहते थे: “हे अल्लाह, तू पाक है और तेरी स्तुति है।”
  • كان يُقبل على جليسه بكله — لا يُشعِره بالفتور — वे पूरा ध्यान अपने बैठे हुए साथी पर देते थे — उससे कभी भी उदासीनता का एहसास नहीं होने देते थे